एक कारीगर या शिल्पकार को उसकी बहुआयामी प्रतिभा के लिए जाना जाता है। हमारे देश में हमेशा से कारीगरों और इनके द्वारा निर्मित वस्तुओं का महत्व रहा है। फिर चाहे उनके द्वारा बनाई गई मिट्टी की मूरत हो या फिर बांस से बनी एक छोटी-सी बांसुरी।

ये कारीगर अपने हुनर में इतने माहिर होते हैं कि ये एक वस्तु को बनाने में पूरी जीवंतता का समावेश कर देते है। इन वस्तुओं में उनके हाथों की कारीगरी, कल्पनाशीलता, कौशल और मेहनत की झलक स्पष्ट नजर आती है। मेहनतकश ये कारीगर किसी भी चीज को हमारी पसंद के सांचे में खूबसूरत और आकर्षक रुप से ढालने में माहिर होते हैं। ऐसे उत्पाद बनाते वक्त ये हमारी जरुरत और पंसद का पूरा ख्याल भी रखते हैं।

घरों में सजाई जाने वाली वस्तुओं को बनाना कारीगरों के लिए किसी साधना से कम नहीं होता। अपनी इसी साधना को दिन-प्रतिदिन और भी नई-नई कल्पनाओं के साथ गढ़ता जाता है। हाथ से बनीं ये वस्तुएं हमारे घर की सुंदरता को कई गुना बढ़ा देती है। ऐसे में एक ग्राहक होने के नाते ये हमारी और आपकी जिम्मेदारी हो जाती है कि हम उनकी प्रतिभा को प्रोत्साहित करें। उनकी कारीगरी कल्पनाओं को अपनी चेतना के पंख दें। चाइनीज चमक के आकर्षण में बंधने के बजाए इन स्वदेशी वस्तुओं की सुंदरता को देखें और इन्हें खरीदकर अपने कारीगरों की मदद करें, उनका सहारा बने और उन्हें बढ़ावा दें।


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कई देशी कलाकारों की यही स्वदेशी वस्तुएं विदेशों तक प्रसिद्ध हो चुकी हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों में इन्हें विशेष पहचान मिली है। लेकिन, विदेशी उत्पादों के चमक-दमक के सामने हम अपनी हस्तशिल्प कला की वास्तविक सुंदरता को दरकिनार करते आये हैं। कोरोना महामारी ने पहले से ही उपेक्षा के शिकार स्वदेशी कारीगरों और उनकी कलाकृत्तियों के लिए परेशानी बढ़ा दी है। बाजार में इनके आकर्षक और जीवंत उत्पादों को खरीदने वालों की कमी के चलते हमारे स्वदेशी कारीगर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। क्या हमने कभी ये सोचा है कि विदेशी वस्तुओं से आकर्षित होकर जाने-अनजाने कहीं न कहीं हम अपने ही देश की सभ्यता और संस्कृति को खत्म कर रहे हैं… ? अपने ही कारीगरों की जीविका में बाधा बन रहे हैं… ? सदियों पुरानी हस्तशिल्प कला के अस्तित्व को खतरे में डाल रहे हैं… ? नहीं… शायद हम ये सब नहीं सोचते… क्योंकि… विदेशी चमक, हमारी पारंपरिक समृद्ध कारीगरी पर हावी हो जाती है।

प्रारंभ से ही अपनी रचनात्मकता के लिए प्रसिद्ध भारत देश में अनेक छोटे-बड़े शहरों में यही कारीगरी और स्वनिर्मित वस्तुएं आज भी आय का एकमात्र स्रोत हैं,  जिससे अनेक परिवारों का भरण-पोषण होता है। मिट्टी के दीपक, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, बांस से बने सजावटी सामान के अलावा सभी चीजें कड़ी मेहनत और महीनों की तैयारी के बाद अपने पूर्ण स्वरुप में आती हैं। इन वस्तुओं को खरीदकर इन कलाकारों की मेहनत को सार्थक किया जा सकता है।


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विदेशी व्यापार को बढ़ावा देकर पिछले करीब-करीब दो दशक से जो गलती हम लगातार करते आ रहे हैं, अब हम मिलकर ही इस गलती को सुधार सकते हैं। हम और आप मिलकर ही अपने कारीगरों और उनके उत्पादों को बढ़ावा दे सकते हैं, उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकते हैं। तो इस दीपावली जब आप खरीददारी के लिए बाजार पहुंचेंगे और स्वदेशी उत्पादों की दुकानों, कारीगरों के स्टॉल्स पर रुककर उनकी वस्तुओं को निहारेंगे, तब निश्चित तौर पर आपको अपनेपन का एहसास होगा, आप महसूस करेंगे कि इन उत्पादों में आपके देश की खुशबू, आपके अपने इलाके की स्थानीय संस्कृति और आपके अपने कारीगर भाई-बहनों की मेहनत की खूबसूरती रची-बसी है, मतलब उत्पाद संपूर्ण स्वदेशी है। इस दीवाली अगर आप इसी भावना से बाजारों में खरीददारी करेंगे तो यकीन मानिए आपके घरों के दीयों की चमक उनके घरों को भी रोशन करेंगी, जिन्हें इस त्योहार में आपके सहयोग और अपनेपन का इंतजार है। अगर हम अपनी जिंदगी में स्वदेशी वस्तुओं को महत्व देंगे और उनसे नाता जोड़ेंगे तो निश्चित तौर पर हम गरीब कारीगरों के जीवन में बेहतर बदलाव का जरिया बनेंगे।

स्वदेशी को महत्व देकर आत्मनिर्भर भारत की दिशा में योगदान देना भी हमारा ही दायित्व है। तो आइए, इस दीपावली पर हम यह निश्चित करें कि दीपोत्सव पर सिर्फ मिट्टी के दीये या सजावटी वस्तुएं ही नही, बल्कि सालभर अथक प्रयास कर तैयार की जाने वाली स्वदेशी वस्तुओं को खरीदकर आत्मनिर्भर भारत के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने में हम अपना योगदान देंगे। हमारे द्वारा खरीदी गई ये छोटी-बड़ी सजावटी और खूबसूरत वस्तुएं इन कारीगरों के घरों में खुशियों की दीपावली कर सकता है।

आप सभी को दीपावली की ढेरों शुभकामनाएं…